13 साल से बेटे को दर्द में तड़पते देखते रहे मां-बाप, अदालत के फैसले के बाद छलक पड़े आंसू
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई एक मार्मिक तस्वीर ने पूरे देश को भावुक कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति मिलने के बाद यह तस्वीर सामने आई, जिसमें मां अपने बेटे के सिरहाने बैठी दिखाई दे रही है। यह तस्वीर सिर्फ एक पल नहीं, बल्कि मां-बाप के 13 वर्षों के संघर्ष, पीड़ा और असीम ममता की मौन कहानी बन गई है। “तस्वीर में मां निर्मला राणा अपने बेटे हरीश राणा के सिरहाने बैठी नजर आती हैं। उनकी आंखों में आंसुओं की नमी, चेहरे पर गहरी पीड़ा और हाथों से बेटे के सिर को सहलाती ममता… मानो वह खामोशी से अपने लल्ला से कह रही हों — “जा बेटा, अब तू सुकून से सो जा… तेरी पीड़ा अब खत्म हो।”

दरअसल, गाजियाबाद निवासी हरीश राणा वर्ष 2013 में एक भीषण हादसे का शिकार हो गए थे। बताया जाता है कि वह एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट लगी। इस दुर्घटना के बाद उनके दिमाग को भारी क्षति पहुंची और वह पर्मानेंट वेजिटेटिव स्टेट (कोमा जैसी स्थिति) में चले गए। डॉक्टरों के अनुसार हादसे के बाद से ही हरीश राणा का शरीर लगभग पूरी तरह निष्क्रिय हो गया था और पिछले 13 वर्षों से वह बिस्तर पर ही थे। लंबे इलाज और तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। डॉक्टरों ने भी स्पष्ट कर दिया था कि उनके ठीक होने की संभावना लगभग न के बराबर है। करीब 13 वर्षों तक बेटे को इसी असहाय हालत में देखते हुए यह पल मां के लिए जितना बड़ा है, उतना ही असहनीय भी है। एक तरफ मां का दिल है, जो अपने बेटे को हमेशा अपने पास रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ बेटे की वह पीड़ा है, जिसे देखकर हर दिन मां का कलेजा छलनी होता रहा।

बेटे की हालत ने पूरे परिवार को लंबे समय तक मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक संघर्ष से गुजरने पर मजबूर किया। रातों की नींद, जीवन की खुशियां और भविष्य की उम्मीदें — सब कुछ जैसे इस दर्द के साये में दब गया। इसके बावजूद माता-पिता ने कभी अपने बेटे का साथ नहीं छोड़ा और हर पल उसके साथ खड़े रहे। इसी गहरे द्वंद्व की छाया मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा के चेहरों पर साफ दिखाई देती है। बेटे का जिक्र आते ही उनकी आंखें भर आती हैं, गला रुंध जाता है और शब्द जैसे साथ छोड़ देते हैं। उनके लिए यह फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि ममता और मजबूरी के बीच लिया गया जीवन का सबसे कठिन निर्णय है। यह मामला केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, करुणा और जीवन की गरिमा से जुड़ी उस गहरी बहस का प्रतीक बन गया है, जिस पर समाज लंबे समय से विचार करता रहा है। 13 वर्षों तक बेटे के दर्द को अपनी आंखों से देखने के बाद माता-पिता ने जिस साहस के साथ यह निर्णय स्वीकार किया, वह यह दिखाता है कि सच्चा प्रेम केवल साथ निभाने में ही नहीं, बल्कि प्रियजन की पीड़ा को समाप्त करने के लिए सबसे कठिन फैसला लेने में भी होता है। माता-पिता के लिए यह क्षण दिल तोड़ने वाला जरूर है, लेकिन कहीं न कहीं उन्हें यह सुकून भी है कि उनका बेटा अब उस असहनीय पीड़ा से मुक्त हो सकेगा, जिसने वर्षों से पूरे परिवार को भीतर तक झकझोर कर रख दिया था।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि मां-बाप का प्रेम निस्वार्थ होता है—वह अपने बच्चे के लिए हर दर्द सह सकता है और जरूरत पड़े तो उसकी पीड़ा खत्म करने के लिए अपने दिल को भी पत्थर बना सकता है।
